Punjabi Poetry
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ਬਿੱਟੂ ਕਲਾਸਿਕ  .
ਬਿੱਟੂ ਕਲਾਸਿਕ
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शहर के दुकानदारो ............

शहर  के  दुकानदारो , कारोबार-ए-उल्फत  में  सूद  क्या जिंआं  क्या है , तुम  न जान  पाओगे

दिल के दाम कितने हैं , ख़वाब कितने महंगे हैं, और नकद-ए जां  क्या है , तुम  न जान  पाओगे

शहर के दुकानदारो ............


कोई  कैसे  मिलता  है , फूल  कैसे  खिलता  है , आँख  कैसे  झुकती  है , सांस  कैसे  रूकती  है ...

कैसे  रह  निकलती  है , कैसे  बातें  चलती  है , शौक  की  ज़बां  क्या  है , तुम  न जान  पाओगे

शहर के दुकानदारो ............

 

वस्ल  का  सुकून  क्या  है , हिज्र  का  जुनूँ  क्या  है , हुस्न  का  फुसूं  क्या  है , इश्क  के  दरूँ  क्या  है

तुम मरीज़-ए-दानाई , मसलिहत  के  शादाई ,  राह-ए-गुमरहां क्या  है , तुम  न जान  पाओगे

शहर के दुकानदारो ............


ज़ख्म  कैसे  फलते  हैं , दाग़  कैसे  जलते  हैं , दर्द  कैसे  होता  है , कोई  कैसे  रोता  है

अश्क  क्या  है  नाले  क्या , दश्त  क्या  है  छाले  क्या , आह  क्या  फुग्हान  क्या  है , तुम  न जान  पाओगे

शहर के दुकानदारो ............

 


नामुराद  दिल  कैसे  सुबह  शाम  करते  हैं , कैसे  जिंदा  रहते  हैं  और  कैसे  मरते  हैं

तुम  को  कब  नज़र  आई  ग़मज़दों  की  तन्हाई , जीस्त  बे-उमाँ  क्या  है , तुम  न जान  पाओगे

शहर के दुकानदारो ............

 

जानता हूँ  मैं  तुम  को , जौक-ए-शायरी  भी  है , शख्सियत  सजाने  में , इक  यह  माहिरी  भी  है

फिर  भी  हर्फ़  चुनते  हो , सिर्फ  लफ्ज़  सुनते  हो , इन  के  दरमियाँ  क्या  है , तुम  न जान  पाओगे
शहर के दुकानदारो ............

31 Oct 2012

j singh
j
Posts: 2871
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Joined: 18/Nov/2011
Location: beautifull
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Khoob......

01 Nov 2012

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