शहर के दुकानदारो , कारोबार-ए-उल्फत में सूद क्या जिंआं क्या है , तुम न जान पाओगे
दिल के दाम कितने हैं , ख़वाब कितने महंगे हैं, और नकद-ए जां क्या है , तुम न जान पाओगे
शहर के दुकानदारो ............
कोई कैसे मिलता है , फूल कैसे खिलता है , आँख कैसे झुकती है , सांस कैसे रूकती है ...
कैसे रह निकलती है , कैसे बातें चलती है , शौक की ज़बां क्या है , तुम न जान पाओगे
शहर के दुकानदारो ............
वस्ल का सुकून क्या है , हिज्र का जुनूँ क्या है , हुस्न का फुसूं क्या है , इश्क के दरूँ क्या है
तुम मरीज़-ए-दानाई , मसलिहत के शादाई , राह-ए-गुमरहां क्या है , तुम न जान पाओगे
शहर के दुकानदारो ............
ज़ख्म कैसे फलते हैं , दाग़ कैसे जलते हैं , दर्द कैसे होता है , कोई कैसे रोता है
अश्क क्या है नाले क्या , दश्त क्या है छाले क्या , आह क्या फुग्हान क्या है , तुम न जान पाओगे
शहर के दुकानदारो ............
नामुराद दिल कैसे सुबह शाम करते हैं , कैसे जिंदा रहते हैं और कैसे मरते हैं
तुम को कब नज़र आई ग़मज़दों की तन्हाई , जीस्त बे-उमाँ क्या है , तुम न जान पाओगे
शहर के दुकानदारो ............
जानता हूँ मैं तुम को , जौक-ए-शायरी भी है , शख्सियत सजाने में , इक यह माहिरी भी है
फिर भी हर्फ़ चुनते हो , सिर्फ लफ्ज़ सुनते हो , इन के दरमियाँ क्या है , तुम न जान पाओगे
शहर के दुकानदारो ............